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द कश्मीर फाइल्स – उठ रहा है सेकुलरिज्म के तिलिस्म से पर्दा, इसीलिऐ सेकूलर उड़ा रहे हैं गर्दा

 द कश्मीर फाइल्स – उठ रहा है सेकुलरिज्म के तिलिस्म से पर्दा, इसीलिऐ सेकूलर उड़ा रहे हैं गर्दा 

द कश्मीर फाइल्स ने कश्मीर में हुये हिन्दू नरसंहार के साथ धर्मनिरपेक्षता के तिलिस्म की भी पोल खोल दी है। इसी कारण ये सभी धर्मनिरपेक्षता के जादूगर व्यथित हैं।

आज चारों तरफ द कश्मीर फाइल्स ने भूचाल  ला दिया है हर कोई इस फिल्म की बात कर रहा है। कोई कह रहा है कि यह फिल्म सच दिखा रही है कोई कह रहा है कि यह आधा सच है कोई फिल्म के टेक्स फ्री कर देने पर सबाल उठा रहा है। हर आदमी अपने अपने तरीके से फिल्म की बात कह रहा है । लेकिन मेरी नजरों में The Kashmir Filesभारतीय सिनेमा की लीक से हटकर बनाई हुयी ऐसी फिल्म है जिसने युगों के सत्य को दिखाने की हिम्मत की है। जिसको छिपाने में भारत के तमाम काग्रेसियों, मार्क्सवादियों, कम्युनिस्टों, सपाइयों, सामाजिक प्रवत्ताओं, नेताओं, निर्देशकों व कलाकारो,पत्रकारों की टीमों ने अपनी सम्पूर्ण तिलिस्मी ताकत झौंक दी थी और भारतीयों को सेकुलरिज्म के तिलिस्म में कैद कर दिया था। यह ऐसा तिलिस्म था जिसने भारत वासियों को इतना मुग्ध कर लिया था कि वे स्वयं अपना स्वरुप तक भूल चुके थे और ये जादूगर इन्हैं जैसा बताते वैसा ही भारतबासी अपना रूप समझने लगते और अगर कोई इन्हैं इनका वास्तविक स्वरुप बताने की कोशिश करता तो वे उसे अपना शत्रु ही समझने लगते। इस तिलिस्म ने हिन्दुओं को जातियों और उपजातियों के विभिन्न वर्गों के विभाजित कर दिया और हर जाति अपने आपको श्रेष्ठ तथा दूसरे को तुच्छ मानने लगी इसके अलावा इस तिलिस्म ने  इस्लाम व ईसाइयत के वास्तविक उद्देश्य व स्वरुप को तो सामने न आने दिया अपितु इनका लुभावना व मनमोहक स्वरुप सामने रखा और इस्लाम व ईसाइयत को इनके ऊपर अत्याचार करने को उकसाया भी और उनका सहयोग भी किया। इस तिलिस्म में हिंदु इन अत्याचारों के लिए कभी अपनी अन्य जातियों को और कभी स्वयं को दोषी मानता, नही तो ये जादूगर उसे एसा मानने के लिए प्रेरित करते। इसी तिलिस्म ने कभी भी कश्मीरी हिन्दुओं पर ही नही भारत में कहीं भी किसी भी समाज पर हुयी इस्लामिक व ईसाई बर्वरता को सामने आने ही नही दिया। और अगर किसी ने सामने लाने की कोशिश की तो उसे साम्प्रदायिक घोषित कर राजनैतिक रुप से समाज में अछूत बना दिया जाता। जनता भी इस तिलिस्म में बहुत साल तक अपने साथ हुये अत्याचारों को समझ ही नही सकी। वह अपना ही खून पीती और समझती कि यह बड़ा स्वादिष्ट है और इनका जादू जनता पर चलता रहा। इस तिलिस्म को फैलाने में भारतीय सिनेमा ने महती भूमिका अदा की जो अभी तक चलती आ रही है। फिल्म में सेकूलरिज्म के नाम पर हिंदू धर्म, उसके मानने वालों,मंदिरो मठों उसके देवताओं परम्पराओं पर कुठाराघात और भारत की मूलभावना को नष्ट करने के लिए जो कुछ बुरा दिखाया व किया जा सकता है किया जा रहा है। और हम फिल्म देख देख कर उसी को सच मानते रहे हैं जो कुछ फिल्मों में देख रहे हैं हम उसका अनुसरण कर रहे हैं। और वास्तविकता को झुठलाते जा रहे हैं। नही तो कहीं क्या सभी पंडे पुजारी बलात्कारी होते हैं या हर बनिया वेईमान और सूदखोर होता है या फिर हर ठाकुर बलात्कारी व स्मग्लर होता है लैकिन फिंल्मों में हम हमेशा यही देखते रहै हैं इसके विपरीत शायद ही कोई मौलवी व पादरी समाज में मानवतावादी हो, मुस्लिम गुंडा भी होगा वह फिल्मों में नेक काम करता दिखाई देगा क्या यह हकीकत है अगर नही तो क्या विना तिलिस्म के हम सच मानते जा रहे थे क्या हमने कभी किसी फिल्म में दिखाऐ गये इन पात्रों का विरोध किया और फिल्मों में हिन्दू लड़की का प्रेमी मुसलमान को दिखाया गया जो बहुत नेकनीयत का दिखाया गया जिसका परिणाम हुआ कि अनेको हिन्दू लड़कियाँ मुसलमान लड़को के प्रेम में दिवानी हो गयी और बाद में जब उनके उनकी जिहादी मानसिकता सामने आयी तो वे बरबाद हो चुकी थीं। हजारों लड़कियों का धर्मपरिवर्तन इन्हीं फिल्मों के कारण हुआ और सैकड़ों लड़कियों से शादी करने के बाद मुस्लिम लड़को का दिल किसी नयी हिन्दू या मुसलमान लड़की पर आ गया और पहली हिन्दू लड़की या तो अपनी जीवन लीला समाप्त करने को मजबूर हुयी या फिर वह कोठे पर बिठा दी गई। 

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खैर बाते बहुत हैं लेकिन आज हम बात कर रहे है फिल्म द कश्मीर फाइल्स की तो

   जिस दिन यह पिक्चर रिलीज हुयी जमाने का वह सच सामने आ गया और उसने दिखा दिया कि जो कुछ अच्छा दिख रहा है उसके पीछे की कड़वी सच्चाई क्या है। आज सभी समाचार पत्र, पत्रिकाऐं, न्यूज चैनल, और अनेकों यू ट्यूव चैनल इस पर बात कर रहे हैं, लेकिन यह एक घिनौना सच है कि मीडिया ने इन कश्मीरी हिन्दुओं के मामले में कभी भी सच को बाहर नही आने दिया। और आज जब इस पर फिल्म बन चुकी है तो ये सभी इस मामले पर बात करने को मजबूर हैं। दुःख का विषय यह है कि इस सबके बाबजूद मीडिया का एक वर्ग इसके अलग मायने लगा रहा है कोई कह रहा है कि इससे भाजपा अपनी राजनीति चमका रही है कोई कह रहा है कि यह आधा सच है कोई कह रहा है कि कश्मीरी हिन्दुओं से ज्यादा कश्मीरी मुसलमानों की मौत हुयी है जो इस फिल्म में दिखाया नही गया है और न जाने क्या क्या कहा जा रहा है । यह कैसी वेशर्मी है जो इन लोगों ने साध रखी है । इन लोगों की मानवता शायद मर गयी है या फिर ये लोग किसी राक्षस के अवतार हैं। इन्हैं किसी के न तो कत्लेआम से कोई लेना देना है न किसी बच्चे की चीखों से इन्हैं न अवलाओं पर हुये अत्याचारों से कोई मतलब है इनका केवल एक ही मतलब है कि अपनी राजनैतिक रोटियाँ कैसे सेकी जाऐं फिर वो चाहें किसी जनसंहार का फायदा उठाकर ही क्यों न हो। यह फिल्म वास्तव में समाज को एक आइना दिखाती है और ऐसी मानसिकताओं से सचेत रहने का संदेश देती है जो अपनी राजनीति अथवा धार्मिक अंधेपन की खातिर किसी भी हद तक जा सकती हैं। इसके अलावा फिल्म ने देश को उस तवलीगी जिहादी व राक्षसी सोच की हकीकत से भी अवगत कराया है जो समय मिलते ही देश को तवाह करने के मंसूवे पाले हुये है, अब जब फिल्म आ चुकी है तो ये सभी सामाज विज्ञानी, निर्देशक, कलाकार राजनेता बौखलाऐ हुये हैं क्योंकि इनका घिनौना सच जनता के सामने आ चुका है। इस फिल्म ने न केवल कश्मीरी हिन्दुओं की त्रासदी को उजागर किया है अपितु भारतीय जनता के ऊपर भी बहुत उपकार किया है इस फिल्म से वे इस समाज की धार्मिक व सामाजिक हकीकत को समझ सकेगें। और आने वाली समस्याओं की आहट को पहिचान कर अपने लिए सही रास्ता चुन सकेगें। अभी तक बहुत से लोगों को इन बातों पर भरोसा नही था खास बात यह है कि आजतक पर दिये इंटरब्यू में कश्मीरी शरणार्थियों के बच्चों ने यह माना कि उन्हैं अपने माता पिता व परिजनों पर हुये अत्याचारों के बारे में सुना जरुर था लेकिन इसकी भयाभयता को फिल्म आने के बाद महसूस किया है। नहीं तो बहुत से बच्चे तो इस सबके लिए अपने माता पिता को ही दोषी मानने लगे थे।

निर्माता-निर्देशक विवेक अग्निहोत्री और उनकी पत्नी पल्लवी जोशी, अभिनेता अनुपम खेर, मिथुन चक्रवर्ती, पुनीत इस्सर जी इत्यादि के सम्मिलित प्रयास से निर्मित इस फिल्म 'द कश्मीर फाइल्स' लीक से हटकर कश्मीरी हिन्दुओं के सच को सामने लाने में जो भूमिका अदा की है उसे भारत देश और उसकी युवा पीड़ी कभी भी भूल नही सकेगी। इस फिल्म पर प्रश्न उठाने वाले बहुत से लोग गुजरात की दारुण घटनाओं पर फिल्म बनाना चाहते हैं उन्हैं फिल्म अवश्य बनानी चाहिये क्योंकि इससे यह सच बाहर आऐगा कि 3000 मुस्लिमों की भीड़ ने निहत्थे कारसेवकों को रेल के डिब्वों में पेट्रोल झिड़ककर मार डाला था। और गुजरात में तीन दिन तक जो हुआ वह केवल उसकी प्रतिक्रिया थी। 

द कश्मीर फाइल्स फिल्म ने हमारी संवैधानिक संस्थाओं के उस सच को भी जनता के सामने रखा है कि एक तरफ हमारा संबिधान समानता और न्याय का शंखनाद करता है और दूसरी और इसी संबिधान की आड़ लेकर तत्कालीन मुख्यमंत्री हिन्दुओं के कत्लेआम की योजना बनाता रहा और जैसे ही योजना का दिन आया तुरंत इस्तीफा देकर चला गया और अपनी जिम्मेदारी  से बचने को एक कानूनी जामा पहनाने में सफल रहा। इसके अलावा उसने पहले ही सभी गांवों से अर्धसैनिक बलों व सेना को हटाकर नगर क्षेत्रों में एक योजना के तहत लगा दिया था जिससे घाटी के हिन्दुओं को बुरे समय में किसी प्रकार की कोई सहायता भी न मिल पाये। क्योंकि उसके इस्तीफा देने के बाद तीन दिनों तक फौज व अर्धसैनिक बलों को किसी प्रकार का आदेश देने का कोई अधिकार किसी के पास नही था। यह एक सोची समझी साजिस थी जिसे कानूनी जामा इसी संबिधान के अंतर्गत पहिनाया गया था। इसके अलावा अगर संविधान इतना मजबूत है तो कश्मीर घाटी में हिंदुओं पर हुए अत्याचार के विरुद्ध विगत तीस-बत्तीस वर्षों में कहीं से भी कोई सशक्त स्वर मुखर क्यों नहीं हुआ। कैसे लाखों हिंदू हत्या, बलात्कार, लूट और आतंक के बल पर घाटी से पलायन को विवश कर दिए गए। उनकी संपत्तियों पर अवैध कब्जे कर लिए गए और एक भी अपराधी को सजा मिलना तो दूर उसके विरुद्ध एफआईआर तक दर्ज नहीं हुई। आखिर क्यों अगर हमारा संबिधान बहुत मजबूत है तो कैसे यह सब संभव हो पाया ? इसके अलावा एक यक्ष प्रश्न और है कि आतंकबादियों के लिए आधी रात खुलकर न्याय करने वाला कोर्ट जो कि किसी भी सामान्य घटना पर भी स्वतः संज्ञान लेने में बड़ा प्रसिद्ध है भारत के एक राज्य मे सारी हिन्दू प्रजाति पर हुये इस अन्याय पर 32 साल कैसे आँखे मूदे रहा यह उस पर और उसकी न्याय व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाता है क्या इसके लिए अभी तक सर्वोच्च न्यायालय के जज अपनी भूमिका पर कोई जबाव देंगे । खासकर जिन न्यायाधीशों ने आधी रात  में कोर्ट खोलकर तथा स्वतः संज्ञान लेकर आतंकबादियों के मामलों को सुना है उनसे जरुर इन सबालों के प्रश्न पूछने चाहिये । नहीं तो ये अनुत्तरित प्रश्न भारत के संबिधान सहित हमारी न्याय व्यवस्था पर एक प्रश्नचिन्ह लगाते रहेंगें। अब समय आ गया है कि भूतकाल में हुयी सभी गलतियों से सबक लिया जाऐ, जो जिम्मेदार है उनकी भूमिका तय की जाऐं दोषियों को सजा मिले । इसके अलावा कलाकृति के नाम पर समाज के सामने झूठ परोसने वाली फिल्मों को निश्चित ही दूर रखा जाए। इन्हैं वेन करने की प्रक्रिया अपनाई जाऐ। कला के नाम पर परोसा गया झूठ भी झूठ ही होता है और इसे किसी भी रुप में सही नही कहा जा सकता है। सत्यता को झुठलाना हमेशा ही मानव के लिए पैरों पर कुल्हाड़ी मारने के समान है पिछले 70 सालों से हम फिल्मों के नाम पर झूठ फरेव और मक्कारी ही देखते आ रहे हैं अब यह रुकना चाहिये। ऐतिहासिक फिल्मों से भी सत्य नदारद कर दिया जाता रहा है जो बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है।

कश्मीरी हिन्दुओं सिखों , बोद्धों के साथ सभी को न्याय मिले चाहे वे मुस्लिम ही क्यों न हों जिन्हौने इस त्रासदी में अपनों को खोया है सभी को न्याय मिलना ही चाहिये। लैकिन किसी को यह नही भूलना चाहिये कि इस घटना के लिए कश्मीर का बहुसंख्यक समाज ही पूरी तरह जिम्मेदार है जिससे वे बच नही सकते क्योंकि हिन्दुओं को अपनी बेटियाँ बहुऐं छोड़कर कश्मीर से चले जाने की आवाजे मस्जिदों से ही आ रहीं थी और इन घटनाओं को अंजाम देने बाले 99.9 प्रतिशत कश्मीरी मुस्लिम ही थे और इनमें पंडितों की बहिन वेटियों बहुओं पर कुटिल नजरे गढ़ाने वाले वे मुस्लिम नौजवान ही शामिल थे जो कभी न कभी किसी न किसी तरह से इन हिन्दुओं से लाभ लेते रहे थे इन्हौने अपने गुरुओं मालिकों मित्रों तक को नही बख्सा। अब समय आ गया है कि इन सभी मक्कारों गुंडो आतंकबादियों को इनकी करनी का फल मिले जो भी राजनैतिक दोषी है या फिर न्यायविद भी दोषी हैं वे सभी बचने नही चाहिये नही तो भारतीय लोकतंत्र पर किसी की आस्था नही रह जाएगी। 

                                        ज्ञानेश कुमार वार्ष्णेय संपादक नमामि गंगे न्यूज पोर्टल

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